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हवा चल रही फल को बिखरा रहे हैं
गरीबों के बच्चों को तरसा रहे हैं
दिया प्यार बेइंतहा जिन्दगी ने
उसी प्यार में खुद को बहका रहे हैं
परायी हूँ पर मान है दो घरों में
उसी मान से घर को महका रहे हैं
ठहर ही गए हैं किसी रेत पर गम
जमीं पर नमी अब ये फिसला रहे हैं
कदम बढ़ चले तुझ से मिलने को नीलम
अना तेरी तुझको ही भटका रहे हैं





