Monday, 29 September 2025

गज़ल 21

 

         


122    122    12 2   122


हवा चल रही फल  को बिखरा रहे हैं
गरीबों के बच्चों  को तरसा रहे हैं


दिया प्यार बेइंतहा जिन्दगी ने
उसी प्यार में खुद को बहका रहे हैं


परायी हूँ पर मान है दो घरों में
उसी मान से घर को महका रहे हैं


ठहर ही गए हैं  किसी रेत पर गम
जमीं पर नमी अब ये फिसला रहे हैं


कदम बढ़ चले तुझ से मिलने को नीलम
अना तेरी तुझको ही भटका रहे हैं


No comments:

Post a Comment