कुछ ख्वाहिशे
जब भी निहारती हूँ आसमाँ को
बन उन्मुक्त पंछी गगन को छूना चाहती हूँ
घिर आए काले बादलों को देख
बन पानी की बूंद उसमें समाना चाहती हूँ
एकसार बहते समुद्र को देख
पानी की बूंद सा गिर सीप बन जाना चाहती हूँ
अनजान सी राहों पर चलकर
अपने पैरों के निशान छोड़ना चाहती हूँ
औरत मर्द के भेदभाव को मिटा
इंसानियत से इंसान की पहचान चाहती हूँ
रात के अंधेरे में कहीं भी बैठ
कुछ देर दिल खोलकर हँसना चाहती हूँ
मुरझाए हुए दागदार चेहरे को
घंटो दर्पण में खुद को निहारना चाहती हूँ
लाख कमियाँ होगी मुझमें
उनसे इतर खुद को तराशना चाहती हूँ
पकड़ ली है नई पगडंडी मैनें
सब कुछ छोड़कर खुद को तलाशना चाहती हूँ
असमंजस सी में है नीलम
पूछती हूँ खुद से क्या कुछ गलत तो नही चाहती हूँ