Monday, 24 May 2021

लाचार रहा होगा

              लाचार रहा होगा


ना हिन्दु ना मुसलमान रहा होगा
कितना अपमानित लाचार रहा होगा

बहाई होगी लाश जब गंगा में यूँ ही
याद तो हर रस्म दाह संस्कार रहा होगा

सोचा होगा दो गज जमीन के लिए
पास ना कोई दोस्त मददगार रहा होगा

कहाँ से इंतजाम करता लकड़ियों का
पास में पैसा ना रिश्तेदार रहा होगा

सब कुछ हो जाने के बाद बहाए दो आँसू
अपनी नाकामी पर छीछालेदर रहा होगा

कैसे लोग भूल पाएँगे पीड़ा दुख अपनो का
नीलम समझ खुद को खाकसार रहा होगा



















Tuesday, 11 May 2021

बेवफा

               बेवफा

जब  भी दोस्त मिला बेवफा मिला
प्यार की जगह धोखा हर दफा मिला

जब भी चाहतों का जिक्र करना चाहा
कोरी किताब सा खाली हर सफा मिला

सुनाने जो निकले मन की बातें दूसरों को
सुनकर दास्तान हर शख्स ही खफा मिला
     
बाजार बना  दाम लगा लेते है रिश्तों का      
सोचते है कितना नुकसान या नफा मिला       

कयूँ गायब है मुस्कान हर इक के चेहरे से     
जिससे भी पूछा वह खुद  से कफा मिला   

गैरों की बात को तो जाने ही दो जानिब
जब भी मिला बस अपनों से ही जफा मिला

निकल पड़ा करो कभी ढ़ूढने पुराने दिनों को
यही वो जगह है जहाँ दोस्तों से शिफा मिला          

होते है कुछ खुशनसीब  लोग दुनिया में ऐसे
नीलम जिनको  वफा के बदले वफा मिला
              कफा __ पीड़ित
              जफा ___ अत्याचार
              



             

Thursday, 6 May 2021

सुखे गुलाब

     सुखे गुलाब


साठ साल पार के
लोगों की किताबें
जब भी खंगाली जाएंगी
हर किताब में एक नई कहानी 
दोहराई जाएगी                                                                                
हर किताब से मिलेंगे कुछ सुखे फूल
कुछ पन्ने मिलेंगे कोनों से मुड़े हुए
शायरी के अंदाज में लिखे कुछ शब्द
जिन्हें देख  उनके चेहरे  खिल जाएँगे
हर  फूल की अपनी दास्तान होगी
कुछ फूल तोड़े होंगे डाली से
माशूका को देने के लिए
अकेले वो मिली नहीं होगी
सामने देने की हिम्मत नहीं होगी
वो वापिस अपनी ही किताब में सहेजे होंगे
कुछ फूल माशूका तक पहुँचे होंगे
पर वो यादों तक ही सीमित होंगे
फूल रखा होगा किताब में
याद में चुपके से आँसू बहाए होंगे
किसी को याद में किताब के पन्नों को
बार बार बेतहाशा मोड़ा होगा
प्यार के इजहार के कुछ शब्द
लिखे होगें पन्नों पर
ना मिल पाने की मजबूरी भी
सिमट कर रह गई होगी शब्दों तक
कुछ शायर बन गए होगें
कुछ रह गए होंगे दीवाने बनकर
         







Saturday, 24 April 2021

कहते कहते रह गए

 कहते कहते रह गए


बहुत कुछ कहते कहते रह गए
मेरे कुछ सपने हवा संग बह गए

जमी हुई थी बर्फ जो रिश्तों में
अनजान बन खामोशी से सह गए

कर रखा था कैद खुद को घर में
बेवजह यादों में ही खोए रह गए

सुनी आहट दिल ने तेरे आने की
लगा सब दर्रे दिवार ही ढह गए

बना लो अपना रहनुमा कोई ओर
किस सुकून से बड़ी बात कह गए

बरसों किया इंतजार जिस आहट का
आकर बता मजबूरियों की वजह गए

छोड़ बीच मझधार में जा रहे हो कहाँ
किसी के सहारे रहने को कयूँ कह गए

कया हुआ सुन दास्तान चाहत की मेरी
कयूँ अश्क तेरे भी बहते बहते रह गए

रजा और सजा जो चाहे मान लो
डाल असमंजस में नीलम को वह गए




Wednesday, 14 April 2021

खुशी के क्षण

 गूथंते हुए आटा

गूथं लेती हूँ
शब्दों को कविता के रूप में
कभी बुहारते हुए घर को
गंद के साथ साथ
नकारात्मक विचारों को भी
फेंक देती हूँ
बुनते हुए स्वेटर
फंदों के साथ साथ
बुन लेती हूँ कुछ ख्वाब
अपने लिए भी
काटते हुए सब्जियाँ
काट लेती हूँ
पाँव में पड़ी बेड़ियों को
सिलाई करते हुए
सिल लेती हूँ
वक्त के दिए जख्मों को
सच तो ये है
चुरा लेती हूँ खुशी के कुछ क्षण
कभी भी कहीं से भी 

Monday, 29 March 2021

कुछ लम्हे खुशी के

 कुछ लम्हे खुशी के 


रूठ कर यूँ ना जाया कीजिए 

कभी प्यार से मनाया कीजिए 


जिन्दगी के कैसे रूप है नित नए 

कभी धूप तो कभी छाया कीजिए 


कुछ लम्हों की बची है जिन्दगी 

यूँ ना बहस में इसे गवाया कीजिए 


दूसरों के चेहरे पर देख सुकून 

अपने मन को ना जलाया कीजिए 


दूसरों के चेहरे पर मुस्कान ला 

खुद के दिल में सुकून पाया कीजिए 


गुजार लो कुछ लम्हें खुशी के भी 

बैठ दोस्तों के साथ खाया कीजिए 


बहुत ही खूबसूरत प्यारी है जिंदगी 

गैर जरूरी बातों में ना जाया कीजिए 


बहुत ही हसीन एहसास है ये प्यार का 

इस एहसास को सीने से लगाया कीजिए 


जरूरत नहीं होती शब्दों मे कहने की 

ज़बां से नहीं आंखों से ही बताया कीजिए 


अपने ही है सब आस पास चाहने वाले 

नीलम यूँ ना किसी को पराया कीजिए 


Saturday, 20 March 2021

निभाओगी कैसे

 निभाओगी कैसे


मोहब्बत है मुझसे ये बताओगी कैसे
मिलोगी जब मुझसे जताओगी कैसे

चेहरा तो छुपा लोगी मास्क से
आँखों की चमक छुपाओगी कैसे

इस तरह डरोगी जमाने से तो
फिर मोहब्बत को निभाओगी कैसे

जंग है ये तो अब लड़नी ही पड़ेगी
हार कर खुद को जिताओगी कैसे

परम्पराओं को बेड़ियाँ समझोगी तो
काटने का हौसला इन्हें लाओगी कैसे

चल पड़ी हो जो साथ मेरे बन हमदम
बीच राह में छोड़ मुझे जाओगी कैसे

यूँ हारकर छोड़ हौसला बैठ जाओगी तो
जमाने को अपनी दास्तान सुनाओगी कैसे

कुचल दोगी हसीन एहसास को यूँ ही तो
प्यार की इस क्यारी को खिलाओगी कैसे

कैसे करते है प्यार खुद को खुद से ही
नीलम ये ज़माने को दिखाओगी कैसे