क्या परिचय दूं अपना
किसी की बेटी बहन बन
जीवन अपना गुजारती रही
किसी की पत्नी बहु बन
वजूद अपना तलाशती रही
बन खुद से अनजान
दोस्ती रिश्ते निभाती रही
एक खाली कोना सा था कहीं
बस उसके बारे में ही विचारती रही
सास बनी नानी दादी बनी
अपने वजूद पर प्रश्न उछालती रही
फिर कागज पर लगी लिखने भावनाएँ
भरते खाली कोने को निहारती रही
पहचान बनी अलग समाज में
अब समझ आया यही था वो मुकाम
जिसे बरसों मैं खंगालती रही