Monday, 9 May 2022

बात करते है

 


            बात करते है

बैठ मेरे पास कुछ राज की बात करते है
ए जिन्दगी तेरे मिजाज की बात करते है

ढूँढनी  चाही  थी जब महक फूलों की
मिले जो खार उसकी ही बात करते है

चलना चाहा जब जाने पहचाने रास्ते पर
तेरी दिखाई अनजान डगर की बात करते है

माना रास्ता लम्बा था संघर्ष से भरा हुआ
चल छोड़ खुशी से मंजिल की बात करते है

राह में कौन मिला बिछड़ा जाने दो सब
जिसने साथ निभाया उसकी बात करते है

किसने हँसी उड़ाई किसने जख्म दिए
चल मरहम लगाने वाले की बात करते है

कयूँ रखे आँख से निकले आँसू का हिसाब
लब पर बिखरी मुस्कान की बात करते है

कुछ हसरते तो सबकी अधूरी रहती है
हम तो जो पुरी हुई उनकी बात करते है

रोने वाले को ही  ओर भी रुलाती है
ये दुनिया जिसकी हम सब बात करते है

चलो भूल जाते है अतीत के दिए दर्द को
बस आज के सुख की नीलम बात करते है
                    

Wednesday, 27 April 2022

शिद्दत

 मेरे सीने में उठा दर्द तेरे चेहरे पर उभर आया

चाहत की शिद्दत से फिर जता भी नही पाया
अब लोग मुझसे तेरे गम की बात पूछते है
तेरी रूसवाई के डर से बता भी नही पाया

Wednesday, 20 April 2022

शब्द

                शब्द

शब्दों की भी अपनी अलग शान है
कहने को लगते निर्जीव से  है
पर शब्दों में  बड़ी जान है
कई शब्द होते है  ऐसे 
जिनमें समाया सारा जहान है
जादू से होते है कुछ शब्द
दुखी चेहरे की बनते मुस्कान है
कुछ करके अलग शब्दों का इस्तेमाल
समाज में बनाते अलग अपनी  पहचान है
कुछ शब्द होते है ऊर्जावान
जगा देते दबे हुए अरमान है
कुछ शब्दों में छिपी होती है प्रेरणा
वो देते सपनों को नई उड़ान है
शब्द ही बिठाते तख्तो ताज पर
कभी दिलाते कफन का सामान है
मिश्री सी घोलते हैं कभी कान में
कभी बजाते ना भूलने वाली तान है
शब्दों का चयन कैसे करना है
अब तो सिखाने के लिए खुल गए संस्थान है
सोच समझ कर बोला करो यारो
इन्हीं से जग में बनती हमारी पहचान है
शब्द चाहे तोड़ दो दिल ना किसी का तोड़ो
टूटे दिल को जोड़ना फिर नहीं आसान है
शब्द टूटकर नए अर्थ में बदल जाते है
नए अर्थ से रचते इतिहास  महान है
        






Monday, 11 April 2022

महिला अधिकार और दुरुपयोग

 


                                          महिला अधिकार और दुरुपयोग

                                    यह सच है कि महिलाओं को संवैधानिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए भी लम्बा संघर्ष करना पड़ा है । हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005  के अनुसार पैतृक सम्पति में बेटियों को बराबर का अधिकार  है  । यह उनका संवैधानिक अधिकार तो है परन्तु सामाजिक तौर पर कितनी ऐसी महिलाएँ हैं जो अपने भाईयों से बराबर का हिस्सा ले सकती हैं या मांग सकती हैं और जो मांगती हैं वह मायके की तरफ से बहिष्कृत हो जाती हैं । बहुत सी औरतें घर में अभाव होते हुए भी अपनी पैतृक सम्पति में सिर्फ इसलिए हिस्सा नहीं माँगती कि कहीं भाई नाराज न हो जाए।  जागरूकता के अभाव में या अनपढ़ता के कारण भी  बहुत सी महिलाएँ अपने अधिकारों को ना जान पाती है ना समझ पाती है और उनके लिए अपने अधिकार की लड़ाई  तो बहुत दूर की कौड़ी होती है ।
                                  दूसरी तरफ कुछ ऐसी महिलाएँ  भी हैं जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं ,  ज्यादा पढ़ी लिखी हैं , समझदार हैं और समाज में व्याप्त असमानता को मिटाना अपना सामाजिक दायित्व समझती हैं । ऐसी महिलाएँ अपना सामाजिक दायित्व बखूबी निभा रही हैं ,फिर भी इनके काम को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही हैं । हालाँकि ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है ।  ये महिलाएँ ऐसी जगहों पर काम कर रही है जहाँ गरीबी है ,अनपढ़ता है । जहाँ औरतों को अपना और अपने बच्चों का पेट भरना है और उसके लिए दिन रात काम करना है ।  उन्हें ना ही अपने अधिकारों का ज्ञान है ना ही जानने की फुर्सत ।  ऐसी महिलाएँ जल्दी से किसी की बात सुनती भी नहीं और समझ भी नहीं पाती । 

                                तीसरी तरफ ऐसी महिलाएँ  भी हैं जो बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी तो नहीं है निश्चित रूप से ही अति महत्वाकांक्षी जरूर है । जिन्होनें अपने अधिकारों की जानकारी  प्राप्त कर ली है और इन्हें ही हथियार बनाकर और इसकी आड़ लेकर समाज की सहिष्णुता को नुकसान पहुंचा रही हैं  ।  उन्हें अपने अधिकारों के सदुपयोग से कम मतलब है वो तो इसकी आड़ लेकर पुरूषों को तुच्छ साबित करना चाहती हैं । वे येन प्रकारेण अपने मकसद को पाना चाह  रही हैं । उनके साथ किसी प्रकार का शोषण नही होता । वे पुरूषों पर यौन उत्पीड़न का , दहेज का , छेड़खानी का या इसी तरह का कोई अन्य आरोप लगाकर अपने लिए सहानुभूति बटोर लेती हैं ।  फिर इस सहानुभूति को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करती हैं । टी वी पर या सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए झूठमूठ के अत्याचार की कहानी सुनाकर सुर्खियाँ बटोरना इनकी आदत में शुमार होता हैं । उनके लिए शोहरत बटोरने का  यह एक बिना मेहनत का रास्ता है जिसमें हींग लगती है ना फिटकरी और रंग भी चोखा होता है ।
                                आज  के समय में बहुत से कानून औरतों के हक में बनाए गए है । इन कानूनों को बनाने का मकसद सिर्फ इतना था कि औरतों को शोषण से बचाया जा सके । आज के समय में इन सब का दुरुपयोग भी बहुतायत में देखा जा रहा है । अभी हाल में ही कोर्ट में भी कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें बिना वजह लड़के व उसके परिवार को दहेज के झूठे केस में फंसाया जा रहा है। बहुत से घरों का  शांतिपूर्ण माहौल इसलिए भी खराब हो रहा है कि बहुएं कानून की धौंस दिखाकर सास ससुर के साथ बदतमीजी कर रही हैं उन्हें डरा धमका रही हैं । लड़कों को शादी के बाद  माता पिता से अलग रहने पर मजबूर कर रही हैं । प्रापर्टी में हिस्सेदार बनने के लिए तलाक तक का सहारा लिया जा रहा है । यह सब देखकर बहुत से लड़के तो शादी के नाम से ही डरने लगे  हैं । जिससे आने वाले समय में हमारा सामाजिक ताना बाना ही प्रभावित होने वाला है ।
                                 बलात्कार से संबंधित धारा 376 ने तो मानों औरतों के हाथ एक ऐसा औजार दे दिया है जिससे वो किसी भी पुरुष के अहं को  ना सिर्फ चोट पहुँचा सकती हैं  बल्कि उसका और उसके परिवार की मान मर्यादा को ही खत्म कर देती है । इस तरह के केस में अपने आप को निर्दोष साबित करने की पुरी  जिम्मेदारी पुरुष पर होती है जोकि बहुत ही मुश्किल काम होता है । कई  बार वह स्वयं को निर्दोष साबित करने में सक्षम नहीं होता और उसे अपना जीवन जेल में ही बिताना पड़ता है । कई  बार बेल मिलने पर जेल से तो बाहर आ जाता है परन्तु जब तक मुकद्दमा चलता रहता है वह सामाजिक प्रताड़ना को सहता  रहता है  ऐसे समय में जब जाॅब छूट जाती है तो उसे और उसके परिवार को आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ता है और उसका मनोबल टूट जाता है ।  वह लोगों की तिरछी निगाहें और उनके व्यंग्य बाणों को सहने में स्वयं को असमर्थ पाता है ।
                                                       1960 और उसके बाद  का दौर ऐसा था जिसमें दहेज के लिए बहुत सी औरतों को जलाया गया उनपर तरह तरह के अत्याचार किए गए । समाज में फैली इस कुरीति को समाप्त करने के लिए और दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए 1986  में आईपीसी की धारा 498 -ए का प्रावधान किया गया । आम बोलचाल की भाषा में इसे दहेज निरोधक कानून कहा गया । सभी के द्वारा इस कानून की सराहना की गई । जब इस धारा के अन्तर्गत केस दायर किया जाता था तो यह एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता था और  मुजरिम की जमानत तक नहीं होती थी और  कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान था । उस समय तो ऐसा लगा कि यह कानून दहेज लोभियों  को अच्छा सबक सिखाएगा । लेकिन धीरे धीरे जब इस कानून का दुरुपयोग होना शुरू हुआ तो बहुत से निर्दोष व्यक्ति भी इसकी बलि चढ़ गए  । 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में आधे से ज्यादा मामले झूठे  है । जुलाई 2017 में 498 A में  कुछ  संशोधन किया गया अब पुलिस  आरोपी व्यक्ति की सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकती उसके लिए हर जिले में जो जाँच कमेटी बनाई गई है पहले वह जाँच करेगी और अगर सबूत मिलते है तो ही गिरफ्तारी होगी ।
                                                                 लेकिन सितंबर 2018 की  सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार ये पावर पुलिस को दे दी गई है वह शिकायत कर्ता की शिकायत पर आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर सकती है । जाहिर सी बात है इस कानून के दुरुपयोग की संभावनाए बहुत ज्यादा थी । एक रिपोर्ट के मुताबिक जितने केस दर्ज किए गए है उनमें 80% झूठे हैं । इसलिए 2021 में 498 A की धारा में कुछ बदलाव किए गए है जिसमें अब पुरुषों  को कुछ राहत दी गई है ।

                                      2005 में बनाया गया घरेलू हिंसा के विरूद्ध महिला संरक्षण कानून का भी बहुत दुरूपयोग हुआ है । कई  जगह तो यह मांग भी उठने लगी है कि प्रताड़ित पुरुष कहाँ जाए।  महिला आयोग की तरह पुरुष आयोग भी  बनाया जाना चाहिए जहाँ पुरुष अपनी बात कह सकें और न्याय की उम्मीद रख सकें । न्यायालय को भी इस मामले में अपना नजरिया साफ रखना चाहिए और कानूनों के दुरुपयोग को रोकना होगा।
                                      शोषण के खिलाफ मिले अधिकार
                                       किसी पर भी ना हो  फिर अत्याचार















Sunday, 3 April 2022

शब्द

                शब्द

शब्दों की भी अपनी अलग शान है
कहने को लगते निर्जीव से  है
पर शब्दों में  बड़ी जान है
कई शब्द होते है  ऐसे 
जिनमें समाया सारा जहान है
जादू से होते है कुछ शब्द
दुखी चेहरे की बनते मुस्कान है
कुछ करके अलग शब्दों का इस्तेमाल
समाज में बनाते अलग अपनी  पहचान है
कुछ शब्द होते है ऊर्जावान
जगा देते दबे हुए अरमान है
कुछ शब्दों में छिपी होती है प्रेरणा
वो देते सपनों को नई उड़ान है
शब्द ही बिठाते तख्तो ताज पर
कभी दिलाते कफन का सामान है
मिश्री सी घोलते हैं कभी कान में
कभी बजाते ना भूलने वाली तान है
शब्दों का चयन कैसे करना है
अब तो सिखाने के लिए खुल गए संस्थान है
सोच समझ कर बोला करो यारो
इन्हीं से जग में बनती हमारी पहचान है
शब्द चाहे तोड़ दो दिल ना किसी का तोड़ो
टूटे दिल को जोड़ना फिर नहीं आसान है
शब्द टूटकर नए अर्थ में बदल जाते है
नए अर्थ से रचते इतिहास  महान है
         नीलम नारंग






Monday, 14 March 2022

मुस्कान

 


          मुस्कान

बहुत दिनों से छाया हुआ था कुहासा
घेरे हुए थी उदासियाँ
फैलता जा रहा था अँधेरा
मन के हर कोने में घर बना लिया था
एकाकीपन और निराशा ने
इन सब से ऊब कर चली आई
फिर से ढूँढने खुद को
स्मृतियों के बागान में
याद किए बचपन के वो दिन
जब खेलती थी मस्ती में
अँधेरा होने तलक बिना किसी फिक्र के
याद किए जवानी के वो दिन
जब बेवजह खिलखिलाती थी घंटो
मेरी उस निश्छल हँसी को देखकर
मुस्कुरा उठते थे वो चेहरे भी
जिनपर छाई रहती थी उदासी महीनों
याद किए वो दिन भी
जब बच्चों की मोहिनी मुस्कान से
मुस्कुरा उठी थी भूलकर सब रंजो गम
सालों से ये मुस्कान ही मेरी पहचान है
फिर  क्यूँ कर रही हूँ कैद अब खुद को
कयूँ ओढ़े  हूँ लबादा जिम्मेदारी का
सोचते ही छँट गए बादल निराशा के
फिर करीने से संवारे सफेद बाल
  फिर झुर्रीदार चेहरे पर आई मुस्कान 

Friday, 4 March 2022

जंग

                  जंग

जंग पर भेजने से पहले हर माँ रोई होगी
फिर  रोक आसूँ देख उसे मुसकाई होगी

हर हाल दुश्मन को फतह करके ही आना
मन ही मन होंठों पर यही दुआ लाई होगी

घर पहुंच जाए मेरा लाडला सही सलामत
उस पार भी है एक माँ सोच घबराई होगी

माँ तो माँ  है  इस पार की हो  या उस पार  
सलामती की दुआ उसके होठों पर आई होगी

युद्ध अपने आप में सबसे बड़ा मसला है
युद्ध से मसले हल करने में  सिर्फ बुराई  होगी

युद्ध से सबको सिर्फ तबाही मिलती है
आम जनता ने बार बार ही की ये दुहाई होगी

बेटा इस पार का मरे या मरे उसपार का
आँख तो बस हर औरत की भर आई होगी

अमन शांति भाईचारा  बना रहे सब ओर
नीलम के मन में बस यही दुआ आई होगी