Tuesday, 1 December 2020

तेरी मेरी परछाई

 तेरी मेरी परछाई 


खवाबों में कुछ खयाल बुने जिसमें
शामिल थे मै और मेरी तन्हाई
आधे अधूरे से उन खवाबों में जाने
क्यू नजर आई तेरी मेरी परछाई

ढूँढने लगी दिन वो अतीत के
जिसने पींग प्यार की डलवाई
बन हमसफर साथ तेरे चली मै
अपने आप से ही मै सकुचाई

दिन थे हसीन चारों तरफ बहार
उतर गई ओढनी और मै शरमाई
दोनों हाथों में थाम चुननर देखा
मिली नजरें जैसे ही चली पुरवाई

दिल ने बात की बढ गई धड़कने
डर गई हो ना जाए जगहसांई
सिमट गई अपने आप में ही
बैठ गया दिल हो ना जाए रुसवाई

थाम हाथों में हाथ पाई दहलीज नई
मिला साथ तेरा मिली मंजिल नई
नए गीत नए रिश्ते हर बात नई
तेरे मेरे मन में बज रही थी शहनाई


Friday, 20 November 2020

याद आने लगे है

 याद आने लगे है 


नए सब्जबाग कयूँ दिखाने लगे हैं
छोड़ महबूब का घर वो आने लगे हैं

बागी हो उठे हैं तेवर देखकर उन्हें
कयूँ रोज नए नजराने लाने लगे हैं

हो जाऊँगी एक दिन मै उसकी
कयूँ मन अपना रोज भरमाने लगे हैं

दोस्ती प्यार में बदलती नहीं यूँ
बेवजह हक अपना जताने लगे हैं

माना सांझी यादें है कुछ बरसातों की
कयूं बातें पुरानी याद दिलाने लगे हैं

हर फासले तय किए है साथ साथ
किसलिए चाहत नई फरमाने लगे हैं

साथ रहने की हसरत पाल ली है
कयूँ ऐसे सपने मन में सजाने लगे हैं

जानते हो फर्क नहीं था तेरे मेरे बीच
अब कैसे बेवजह शान दिखाने लगे हैं

दरक गया जो रिश्ता वक्त ओ हालात से
दोबारा उसके फसाने कयूँ बनाने लगे हैं

खत्म हो गए थे एहसास जिसके लिए
बीते वक्त की बात कयूँ दोहराने लगे हैं


Friday, 13 November 2020

दिवाली

 दिवाली 

मैं एक कुम्हार
चाक पर करता जाँ न्योछार
मेरे सपने सजते जाते
जैसे जैसे मिट्टी ले आकार
मेरे घर भी मने दिवाली
आए मिठाई और फलाहार
चाक पर जल्दी हाथ चलते
ख़ुशियों का ना कोई पार
बिक जाए सारा सामान
भर जाए मेरे भी भंडार
मन मे सपने सजाए
करते जाए सारे कार
नीलम की भी है यही हसरत
इसकी सुने सब परिवार
मत करना इसको रुसवा
कर रही यही प्रार्थना बारमबार
दीए जलाओ ख़ुशियाँ मनाओ
चारों ओर लाओ नई बहार
सबके घर मने दिवाली
मन से दिए बनाए कुम्हार 

Friday, 6 November 2020

चुनाव

                                  चुनाव 


           चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
           लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
मंजर से बदलने लगे हैं
कुछ लोग निखारने लगे हैं
सीधे मुँह बात ना करने वाले
सहानुभूति सी जताने लगे है
             चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
              लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
नए सब्जबाग दिखाने लगे हैं
पलकों पर सपने सजाने लगे हैं
गरीबों का हक मारने वाले
गरीबी हटाने की बात कराने लगे हैं
                         चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
                       लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
खोलने लूट के खजाने लगे हैं
अपराध का ग्राफ बढ़ाने लगे हैं
शायद जीत मिल जाए ऐसे ही
होड़ में गुंडागर्दी दिखाने लगे हैं
                           चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
                           लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं 
बात करते हैं आधी आबादी के हक की 
टिकट माँगने पर आँखे दिखाने लगे हैं
ढहाते  हैं जुल्म औरतों पर गाहे बगाहे
अब आबरू बचाने की बात करवाने लगे हैं
         चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं 
         लगता है फिर चुनाव करवाने  लगे हैं 




Friday, 30 October 2020

बिन तेरे

 बिन तेरे 


तेरे बिन जो गुजरी कैसी ये रात आई है
बिन तेरे कैसी सावन की बरसात आई है

हर लम्हा जो गुजरता था साथ तेरे
आज कैसी ये कयामत की रात आई है

चेहरे से मुसकान उतर गई नकाब की तरह
पलकों के हिस्से आँसू की सौगात आई है

तेरे चेहरे को देखे बिन देखी दुनिया
आज कैसी ये मनहूस प्रभात आई है

नजरों से ना जुदा होते थे पल भर भी
उम्रभर जुदा रहने की बात आई है

ना कोई गिला ना शिकवा बस बेबसी
आज कैसी ये आखिरी मुलाकात आई है

चुपचाप नजरों में बसाना है हमेशा के लिए
आज विधाता की ये कैसी करामात आई है











Wednesday, 7 October 2020

कसक बाकी है

 कसक बाकी है 


उन उजले चंद लमहों की कसक बाकी है
आज भी तुझसे मिलने की ललक बाकी है

पहला फूल जो दिया पयार के इजहार में
आज भी सांसों में उसकी महक बाकी है

मिश्री से शब्द जो बोले थे कानों में कभी
आज भी कान में बोल की खनक बाकी है

डाल हाथों में हाथ चले थे जब साथ साथ
लड़खड़ाते से उन कदमों की चहक बाकी है

संजोए थे जो सपने हमनें सुनहरी शाम के
तेरी याद के सहारे छूना वो फलक बाकी है

नाराजगी जो कभी जाहिर की प्यार से
अलग अंदाज से मनाने की सनक बाकी है


मुझे देखकर आ जाती थी तेरे चेहरे पर रौनक
दिल में बसी वो तेरे चेहरे की झलक बाकी है


रूठ कर चले गए जो मझधार में छोड़कर
आज भी नीलम की नम हुई पलक बाकी है








Sunday, 27 September 2020

बेटी जैसा

 बेटी जैसा 

मुझेभी अब समझ आया
जब क्षीण हो गयी काया
अकेलेपन में विदा की हुई
बेटी का हँसता चेहरा नजर आया
हाय रे
सब बेटी को ही कयूं बतलाया
बेटे को क्यु ना कुछ समझाया
क्यु ना डाली घर की जिम्मेदारी
क्यु ना घर का काम सिखाया
जब घर दो लोगों का है
तब दोनों को क्यु ना बराबर समझाया
बचपन में जो था पढाना
ज़वानी में भी ना पढाया
खुशियों में ना साथ हँसाया
दुखों में ना पास बैठ रुलाया
जब बेटी को बेटे जैसे पाला
निर्भीक बना भेजा बाहर
अपनी रक्षा को सक्षम बनाया
तो क्यु ना बेटे को बेटी जैसे बनाया
रोटी बनाना कपड़े धोना सिखाया
चूक हुई मुझसे ही कहीं
अब बेटे को ही क्यु दोषी ठहराया
एहसास तो गलती का उसे भी है
ऐंठ में गलती मानना भी कहां भाया
अब भी वक़्त है संभल जाओ ए माओं
बेटे को कुछ कुछ बेटी जैसा बनाओ
नीलम नारंग