Tuesday, 4 August 2020

कठिन दौर




                                      कठिन दौर 

                   ये कैसा कठिन दौर है आया 
                  अपनों को अपनों से डराया 

                वायरस को समझ नहीं पाया 
                 हर तरफ  है  खौफ का साया 
             
              रोज की भागदौड़ ने छकाया 
              वायरस ने घर में कैद करवाया 

              मजदूरों को घर से बेघर करवाया 
              तपती धूप में सड़को पर भगाया 
  
                माली हालत ने सबको सताया 
                दूरियों की जरुरत का समझाया 

              नियम बनाकर सबको समझाया 
              समझ कर भी समझ न कोई पाया 

              घर की जिमेदारी ने सबको भगाया 
               डर के साए ने भी हौसला बढाया 

                जीने का नया पाठ बच्चों को पढाया 
              अपना बचपन फिर से याद करवाया 


          

Tuesday, 28 July 2020

देश के पहरेदार




                   देश के पहरेदार

          हो रही है कैसे  जिंदगी की
          गुजर बसर देख लो
        मच रही है हाय तौबा चारों ओर
       घुमा के नजर देख लो

      डूब रहे है लोग बाढ़ के पानी में
      मचा हाहाकार देख लो
     छोड़ कर हित जनता के नेता लड़ते
       वोट के खरीददार देख लो

       लड़ा देते है इंसान को इंसान से
       ऐसे देश के पहरेदार देख लो
       धर्म के नाम पर आपस में कटते मरते
        लोग जिम्मेदार देख लो

       करके झूठे वादे आ जाते राजनीति में
       नहीं होते सपने साकार देख लो
       लूट खसोट मचाते दूसरों को लड़वाते
       राजनीति के ठेकेदार देख लो 

Tuesday, 21 July 2020

अखबार आज का



                                     अखबार आज का

       अबूझ पहेलियों से भरा है अखबार आज का
       बस बता रहा जातीय समीकरण आज का

       पेज भरा हुआ है मौज मस्ती के विज्ञापनों से
      दूसरी ओर बेजार फटेहाल मजदूर आज का

      एक पेज पर है अधनंगी तस्वीरें औरतों की
     कुछ की मजबूरी कुछ मजा लेती आज का

      बांटते कम हैं राशन दिखावा करते ज्यादा
      कुछ इस तरह हो गया है सेवादार आज का

        हर तरफ डर परेशानी बढ़ता दायरा शक का
       बढ़ गया संक्रमण ख़राब है माहौल आज का

       ऐसे में भी लगे हैं बटोरने चोरी का धन माल
     कितना खुदगर्ज हो गया है इंसान आज का

      सच से कोसो दूर है नहीं जगह है समानता की
      अखबार नहीं  दिखा रहा झूठ फरेब आज का  

Tuesday, 14 July 2020

बूँद



                             बूँद
      जब भी भर जाती हो गुब्बार से
      दब जाती हो अपने ही बोझ से
      बरस के खुद को हल्का कर लेती हो

     गिर के धरती पर बन दूसरे की ख़ुशी
     बन पानी समा जाती हो धरती में
     बन बूँद कभी खुद को सीप कर लेती हो 

     पैदा कर देती हो चमक आँखों में
    लहलहाती फसल देखकर
    बन बूँद किसान को खुश कर लेती हो

     देखकर तुझे हर्ष उठता है प्रेमी
     साहस मिलता है प्रणय निवेदन का
    बन ख़ुशी प्रेमी की आँखें नाम कर लेती हो  

Tuesday, 7 July 2020

पहेली सी जिंदगी





                   जो कभी थी बहुत प्यारी मुझे
               अब बन गयी पहेली जिंदगी

             खुशियाँ ना रास आई इसको
             हो गयी कितनी अकेली जिंदगी

              थे हर तरफ हरियाली और गुलाब
              बन गयी जैसे फूल चमेली जिंदगी

              रिपु सी लगने लगी है अब 
              कभी थी जो प्यारी सहेली जिंदगी

             हारना तो मुझे भी नहीं है तुझसे
            सोच लूंगीमिली नई नवेली जिंदगी


























































           

Monday, 29 June 2020

जीने का हुनर आना चाहिए


 दुःख तो सबके जीवन में है
दुखों का निवारण करना आना चाहिए
दुःख को समझते सभी है
दूसरे की आंख से आंसू पौंछना आना चाहिए
जो किया किसी के लिए नेक काम
नेकियों को दरिया में डालना आना चाहिए
अपने रिश्ते तो सभी के पास है
झुक कर रिश्तों को निभाना आना चाहिए
खिलौने है यहाँ सब माटी के
बनाने के लिए बस मिट्टी को गलाना आना चाहिए
कहने को तो सब साथ होते है
जरूरत पर साथ खङे होना आना चाहिए
ख्वाब तो सभी देखते हैं
बस सपनों को साकार करना आना चाहिए
खुशी देते हैं जो लम्हे हमें
बस खुशी के लमहों को बचाना आना चाहिए
उठना है दूसरे की नजरों में गर
बस अपना वजूद पहचानना आना चाहिए
जीने को तो सब जीते हैं
दूसरों के साथ जीने का हुनर आना चाहिए
क्यू सोचता है गम की बात
बस उनसे इतर मुस्कुराना आना चाहिए
राह दूसरों की आसान करने के लिए
अगुवाई के लिए रहनुमा बनना आना चाहिए

Saturday, 20 June 2020

पापा आज फिर तुम याद आए




   पापा आज फिर तुम याद आए

      ऐसा पहली बार नहीं हुआ
      अक्सर याद आते हो
       बहुत ख़ुशी में या बहुत गम में
      अचानक खाली बैठे हुए
        या कभी भरी महफ़िल में
       या परेशानी में होती हूँ
           सोचती हूँ काश बैठी होती पहलु में
              तुम्हारा प्यार 
          समेट भी नहीं पाई झोली में
          रीता बीता बचपन मेरा   
        कैसे शामिल होऊं हँसी ठिठोली में
     पापा आज फिर तुम याद आए
     जब बैठी दोस्तों की टोली में