खारी फितरत
एक तरफा इश्क की
बानगी तो देखिए
छोड़ देती हैं नदिया
अपनी शोखी अपनी चंचलता
आतुर हो उठती है मिलने को
उस प्रियतम से
जिससे ना मिली है कभी
ना जानती हैं जिसकी खारी फितरत को
हिस्सा बन जाती हैं उस विशाल समुद्र का
छोड़ अपना वजूद अपना अस्तित्व
खारी फितरत
एक तरफा इश्क की
बानगी तो देखिए
छोड़ देती हैं नदिया
अपनी शोखी अपनी चंचलता
आतुर हो उठती है मिलने को
उस प्रियतम से
जिससे ना मिली है कभी
ना जानती हैं जिसकी खारी फितरत को
हिस्सा बन जाती हैं उस विशाल समुद्र का
छोड़ अपना वजूद अपना अस्तित्व
बासमती चावल
बासमती चावल के खेतों के बीच
बनी सड़क पर से गुजरते हुए
जो महक उठती है
वो रच बस जाती है दिमाग में
मन करता है घंटों बैठे रहे वहीं
पर मंजिल पर पहुँचने की जल्दी
वंचित कर देती है उस सुख से
बढ़ जाते हैं आगे सफर पर
वक़्त की कमी को कोसते हुए
जहन से निकाल कर खुश्बू
खारी फितरत
एक तरफा इश्क की
बानगी तो देखिए
छोड़ देती हैं नदिया
अपनी शोखी अपनी चंचलता
आतुर हो उठती है मिलने को
उस प्रियतम से
जिससे ना मिली है
ना जानती हैं जिसकी खारी फितरत को
हिस्सा बन जाती हैं उस विशाल समुद्र का
छोड़ अपना वजूद अपना अस्तित्व
साहिल से
टकरा कर समुद्र साहिल से
मन में उठती तंरगों को
शांत कर लेता है
झरने से गिरता पानी
टकरा कर पथरीली चट्टानों से
शांति से बह निकलता है
कल कल बहती नदियाँ
टकरा कर अपने ही शिलाखंड से
संगीत को जन्म देती है
प्रकृति कितने सुन्दर सुर छेड़ती है
झीगूंर
रात के सन्नाटे को चीरती
झींगूरों की आवाज
अंधेरे में रोशनी बिखेरते
टिमटिमाते घुमते जुगनू
ऐसा प्रतीत होता है
मानो रास्ता दिखा रहे हो
अकेले चलने वाले राहगीर को
यह एहसास करवा रहे हो
कि तुम अकेले नहीं हो इस राह में
हम भी तुम्हारे साथ है
जहां जन्माष्टमी आने पर
मुसलमान सीते थे
राधा कृष्ण की चोलियां
ईद आने पर जिस शहर में
हिंदू जुलाहे बनाते थे टोपियां
एक नेता भाषण क्या देकर गया
उस शहर की हर गली में
बन गई अलग अलग धार्मिक टोलियाँ
फिर नेताओं ने खेला एक खेल
पैसों से लगाई समर्थकों की बोलियाँ
मानवता हुई तार तार सड़कों पर
गली गली बिखरी टोपियां ओ चोलियां
ਪੀ ਲੈਂਦੀ ਮੈਂ ਸਾਰੀ ਕੜਤਣ ਜੇ ਪੀ ਸਕਦੀ
ਊਨ੍ਹਾਂ ਦੋਸਤਾਂ ਦੀ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਸੀ ਬੰਦਗੀ
ਖੁਸ਼ਨੁਮਾ ਮਹਫਿਲ ਸਜਦੀ ਸੀ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ
ਲਗਦਾ ਹੈ ਬਸ ਉਹੀ ਸੀ ਸੋਹਣੀ ਜਿੰਦਗੀ