अंधेरों का डर दिखाते जिसे हो
उजालों के किस्से बताते जिसे हो
जुगनुओं संग दोस्ती है उसकी
रोशनी का मरीद बना डराते जिसे हो
अंधेरों का डर दिखाते जिसे हो
उजालों के किस्से बताते जिसे हो
जुगनुओं संग दोस्ती है उसकी
रोशनी का मरीद बना डराते जिसे हो
आईना नाराज हो पूछने लगा मुझसे
कितने दिन हो गये मिले हुए खुद से
बातें तो बहुत करने लगी हो हर एक से
झांकना छोड़ दिया खुद के दिल में जबसे
आजादी
वह औरत कितना झूंझलाई होगी ।
जब बेटी काफिरों के हाथ आई होगी।।
खुद की जान बचाने को भागी होगी ।
बेटी से बिछड़ने पर जार जार रोई होगी ।।
किसने देखी होगी पीड़ा उसके मन की।
कोईऔरत ही उसका दर्द समझ पाई होगी।।
घर बार बेटी वतन सब छूट गया पीछे।
क्या उसने आजादी की खुशी मनाई होगी।।
वो औरतें जो कैद कर ली गई घरों में।
क्या उनकी कभी फिर हुई रिहाई होगी।।
कितना दुख देखा आजादी के नाम पर।
मरते दम तक भूल ना वह पीड़ा पाई होगी।।
उम्र भर बिछड़ने का गम सालता रहा ।
उनके लिए कैसी आजादी आई होगी ।।
आंगन
अपनों के प्यार मनुहार से सरोबार
खुशियाँ बिखेरते वो सांझे आंगन
सलीके से गोबर मिट्टी से लीपे पुत्ते
सोंधी खुश्बू बिखेरने वाले वो आंगन
गूंजती थी जहाँ किलकारियां बच्चों की
बुजुर्गों के आशीर्वाद से फलते वो आंगन
बच्चे सांझे करते थे विचार अपने अपने
दुख सुख बांटते तनाव घटाते वो आंगन
खूबसूरत यादें सिमटी हुई है बचपन की
आज भी बहुत याद आते हैं वो आंगन
सिमट गया है मोबाइल गेम में बचपन
नीलम क्यूँ ना सहेजा गया हमसे वो आंगन
संहार
मत समझो खुद को देवी का अवतार
करना है अपने ही शत्रुओं का संहार
बहुत मान लिया खुद को कमजोर
अब उठाना पड़ेगा हमें भी हथियार
एक औरत की देह से ही पैदा होकर
तूं उसपर ही करे मनमाना अत्याचार
अपने पति बच्चों के लिए लड़ती सबसे
अपनी पर आई तो कर जाएगी हद पार
उठो बहनों लिखो इस जुल्म के खिलाफ
छोड़कर आसूं करो कलम की तेज धार
जुल्म करने से भी बुरा है सहना जुल्म को
जता दो बता दो अब नहीं सहन होगी हार
कोई हक नहीं तुम्हे यूँ छूने का बदन को
सदियों से भरी नफरत कर देगी तार तार
ਆਜ ਫੇਰ ਔਹੀ ਵੇਹੜਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਹਸਦਾ ਘਰ ਤੇ ਔਹਿ ਚੌਕਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਤੰਦੂਰ ਤੇ ਲਗੀ ਰੋਟੀ ਤੇ ਹਾਰੇ ਤੇ ਬਣਦੀ
ਦਾਲ ਦਾ ਸਵਾਦ ਅਨੋਖਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਚਰਖਾ ਕਾਤਦੀ ਹੋਈ ਤੇ ਦਰਿਆ ਬੂਨਦੀ ਮਾਂ
ਮੰਜੇ ਦੀ ਦੌਣ ਕਾਸਦਾ ਬਾਪੂ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਗੋਡੇ ਗੋਡੇ ਪਾਣੀ ਚ ਖੇਡਦੇ ਭੈਣ ਪਰਾਂ
ਗੁਲਗਲੇ ਖਾਂਦੇ ਜਦੋ ਵਸਦਾ ਮੀਂਹ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਗੋਹੇ ਕੂੜੇ ਦਾ ਕਾਮ ਸੀ ਮਾੜਾ ਜਿਦੇਂ ਤੋ
ਬਚਦਾ ਟਬਰ ਸਾਰਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਦੂਧ ਮਲਾਈ ਦੀ ਨਾ ਕੋਈ ਘੱ ਨੂ ਸਾਣੀ ਰਲਾਂਦਾ ਚਾਚਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਵਾਰ ਤਿਓਹਾਰ ਚੌਕੇ ਚੌਂ ਆਉਂਦੀ ਸੀ ਮਹਕ
ਹਰ ਦੀਵਾਲੀ ਨਵੇਂ ਕੱਪੜੇ ਪਾਣਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ
ਅੱਜ ਵੀ ਵਾਗ ਪੲ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਅੱਥਰੂ
ਜਦ ਮਾਂ ਪਿਉ ਦਾ ਹਸਦਾ ਚਿਹਰਾ ਚੇਤੇ ਆ ਗਿਆ