आंगन
अपनों के प्यार मनुहार से सरोबार
खुशियाँ बिखेरते वो सांझे आंगन
सलीके से गोबर मिट्टी से लीपे पुत्ते
सोंधी खुश्बू बिखेरने वाले वो आंगन
गूंजती थी जहाँ किलकारियां बच्चों की
बुजुर्गों के आशीर्वाद से फलते वो आंगन
बच्चे सांझे करते थे विचार अपने अपने
दुख सुख बांटते तनाव घटाते वो आंगन
खूबसूरत यादें सिमटी हुई है बचपन की
आज भी बहुत याद आते हैं वो आंगन
सिमट गया है मोबाइल गेम में बचपन
नीलम क्यूँ ना सहेजा गया हमसे वो आंगन
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