Tuesday, 28 September 2021

उम्रभर

                      उम्रभर


तेरी मुस्कुराहट को देख मुस्कुराया उम्रभर
हर एक गम तुझसे ही मैनें छुपाया उम्रभर

ना चाहतें ही कम होने दी ना ही खुशियाँ
तेरी हर जुस्तजू को माथे से लगाया उम्रभर

सीने में दबा लिया हर राज रंज ओ गम को
अपने गम में भी चेहरा तेरा सहलाया उम्रभर

लोग सीढी बना तुझे खेलते रहे मेरे अरमानों से
झूठे जज्बातों का ये कैसा कहर ढाया उम्रभर

तेरे शौंक की खातिर रीति बीत गई जिन्दगी
फिर भी मुस्कुराने का हुनर ना गवाया उम्रभर

जिन्दगी की तरह तेरी मौत भी बनी मजाक
इसी एक कसक  ने नीलम मुझे रुलाया उम्रभर 






Monday, 20 September 2021

नेक काम

                                       नेक काम

रमा बहुत गरीब थी उसके दो बेटे थे करण और  अर्जुन । अभी करण 10 साल का था और  अर्जुन 9साल का था तभी से उसकी  माँ का सपना था कि अर्जुन और करण डाक्टर बने और गरीब लोगों का मुफ्त में इलाज करें ।   कुछ  साल  बाद तीनों की कड़ी मेहनत रंग लाई और वो दोनों डाक्टर बन गए । एक दिन   एक अमीर  बीमार बूढा जिसका नाम बलविंदर सिंह था उनके पास आया उसका आप्रेशन होना  था पर उसके बच्चे उसको बचाना  नही चाहते थे । उसके बेटे ने डाक्टर करण से कहा , " मेरे पिताजी बूढ़े हो गए है उनको मरना तो है ही उनके इलाज  पर पैसे लगाने से क्या फायदा । आप उन्हें जहर देदें जिससे वो आसानी से  मर जाए।  " करण ने कहा डाक्टर का काम जान बचाना होता है मै इन्हें  बचाने की हर संभव कोशिश करूँगा।  आप पैसा नही देना चाहते तो मत दें । मै इनका इलाज मुफ्त में कर दूँगा बस दवाईयों वगैरह पर जो खर्च हो वो दे देना । दरवाजे के पीछे खड़ा बूढ़ा व्यक्ति सारी बातें सुन रहा था ।
                                                     आप्रेशन के बाद बूढ़ा व्यक्ति ठीक हो गया और ठीक से चलने फिरने  लायक हो गया ।  दो तीन महीने बीतने पर एक वकील करण से मिलने आया उसने एक करोड़ का चैक पकड़ाते हुए कहा कि बलविंदर सिंह ने यह आपके लिए  भिजवाया है जिससे आप गरीब लोगों का मुफ्त इलाज कर सको । इसके अलावा अपना घर भी आपके नाम कर दिया है उनके  मरने के बाद आप वहाँ अस्पताल बनाना जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज कर अपनी माँ का सपना पूरा करना ।
                    
                                               



























Tuesday, 14 September 2021

लाडला

 जब झूले में था तब से लगा सपने दिखाने

लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
         कभी छुपता था पेड़ों के पीछे
         नन्हें पाँव से दौड़ता था छाँव में
         लुका छिपी खेलता था साथ मेरे
         मरहम लगा भरता था घाव मेरे
अब बड़ा हो लगा प्यार से समझाने
लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
          देख तेरे चेहरे पर सेहरा सजा
          मिट गई मेरे जीवन की कजा
              प्यार से चूम लूँ माथा तेरा
         अब आए तुझे जीने का मजा
मेरी दुआओं से चला  नया संसार बसाने
लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
         सच हो सपने तेरे सब सुहाने
        आग में तपकर हुआ है कुन्दन
         महके तेरा जीवन जैसे चंदन
        प्यार से महकता रहे ये बंधन
मन लगा तेरे लिए नित नए सपने सजाने
लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
 
      



















Wednesday, 1 September 2021

ईन दिनों

 जाने क्यूँ बहुत याद आने लगे हो इन दिनों

देखे थे ख्वाब साथ जो पुरे हो रहे इन दिनों

मसला मेरा स्वाभिमान से जीने का था बस
दिल को कचोट रहे है कुछ सवाल इन दिनों

तेरे जाने से छूट गए थे जो रंग जीवन में
फिर से  बस वही रंग भाने लगे है इन दिनों

छोड़कर मुस्कुराना सीख लिया था जीना
तुझ बिन भी महफिल भा रही है इन दिनों































Saturday, 21 August 2021

माँ बाप का घर

 ज्यादातर लड़कियों को घर में हिस्सेदार नही माना जाता । इसी विषय पर है मेरी कविता जिसका शीर्षक है  माँ बाप का घर लड़की अपने भाई से पूछ रही है

               माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
जिस घर में जन्मी मै
उस घर में जन्मे तुम
एक साथ पले बढे
एक साथ लड़े हम
                    फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
        तुम खेले सड़कों पर
         मैनें घर को बुहारा
        माँ के बीमार होने पर
         रोटी के लिए मुझे पुकारा
                   फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
घर बनाने के लिए पत्थर ढोया
पानी के लिए नल मैनें चलाया
दुख सुख को एक साथ बिताया
अच्छा बुरा सब एक साथ निभाया
                     फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
कुछ  पैसे देकर तुझे आगे पढाया
मुझसे  माँ ने घर का काम कराया
आज तुझसे ज्यादा डिग्री पास मेरे
दुख में खुशी का अहसास कराया
                    फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ

Thursday, 29 July 2021

बिन मेरे

            बिन मेरे

जब वो मेरे शहर में आए होगें
शाम के धुँधलके तब छाए होगें

डाल हाथों में हाथ घुमे  थे कभी
सुहाने मंजर तो वो याद आए होगें

हुक सी तो उठी ही होगी सीने में
जब बादल आसमाँ में छाए होगें

ढूँढ रहे होगें शहर की गलियों में
हर कहीं अक्स मेरे नजर आए होगें

मुहब्बत में ये कैसी बेबसी होती है
दिल की बात को ना बता पाए होगें

हँस हँसकर बातें की होगी सबसे
कैसे नम आँख के कोर छुपाए होंगे

बैठे होगें महफिल में साथ सबके
उनमें भी  आए नजर मेरे साए होगें

करवटें बदली होंगी रात  बिस्तर पर
क्या जख्म किसी को दिखाए होगें

अपने दर्द को दिल में ही दबाए होगें
नीलम जब वो मेरे शहर में आए होगें
          





Sunday, 18 July 2021

बिछड़ कर

               बिछड़ कर

उसके जाने के बाद पैगाम आने लगे
कयूँ यादों के साथ सलाम आने लगे

बिखर गए थे जो मोती कभी टूटकर
वो माला बनाने के काम आने लगे

छोड़ आए थे जिन्हें  किसी मोड़ पर
जुबां पर उनके ही नाम आने लगे

खुश हुए थे कभी जिनकी वजह से
याद वो किस्से पुराने तमाम आने लगे

रूक गई थी जो जिन्दगी किसी के लिए
रूकी सी जिन्दगी में नए मुकाम आने लगे

बीता दी उम्र जिसको तन्हाई में याद करके
उसके जाने पर इश्क के इल्जाम आने लगे

चाहा था  कभी जिसे दिल की गहराई से
गए तो पीर फकीर याद सब धाम आने लगे

कट रही है जिन्दगी पुरानी यादों के सहारे
नीलम बिछड़ कर जीने केअंजाम आने लगे