गजल 27
122 122 12 2 122
1किए दफ्न सारे ही अहसास मैनें
किया जो नया हास परिहास मैंने
2दिलों को गया छू ये अंदाज मेरा
निभाए सभी वायदे खास मैनें
3बिलखते यूँ बच्चे मिले भूख से जब
किया फिर यूँ दिनभर ही उपवास मैंने
4कहो कम करेंगे प्रदूषण हमीं सब
सिखाया सभी को बिठा पास मैंने
5.बढ़ी उलझनें जब भी जीवन में नीलम
किया किसलिए खुद को भी यास मैंने






