महिला अधिकार और दुरुपयोग
यह सच है कि महिलाओं को संवैधानिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए भी लम्बा संघर्ष करना पड़ा है । हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के अनुसार पैतृक सम्पति में बेटियों को बराबर का अधिकार है । यह उनका संवैधानिक अधिकार तो है परन्तु सामाजिक तौर पर कितनी ऐसी महिलाएँ हैं जो अपने भाईयों से बराबर का हिस्सा ले सकती हैं या मांग सकती हैं और जो मांगती हैं वह मायके की तरफ से बहिष्कृत हो जाती हैं । बहुत सी औरतें घर में अभाव होते हुए भी अपनी पैतृक सम्पति में सिर्फ इसलिए हिस्सा नहीं माँगती कि कहीं भाई नाराज न हो जाए। जागरूकता के अभाव में या अनपढ़ता के कारण भी बहुत सी महिलाएँ अपने अधिकारों को ना जान पाती है ना समझ पाती है और उनके लिए अपने अधिकार की लड़ाई तो बहुत दूर की कौड़ी होती है ।
दूसरी तरफ कुछ ऐसी महिलाएँ भी हैं जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं , ज्यादा पढ़ी लिखी हैं , समझदार हैं और समाज में व्याप्त असमानता को मिटाना अपना सामाजिक दायित्व समझती हैं । ऐसी महिलाएँ अपना सामाजिक दायित्व बखूबी निभा रही हैं ,फिर भी इनके काम को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही हैं । हालाँकि ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है । ये महिलाएँ ऐसी जगहों पर काम कर रही है जहाँ गरीबी है ,अनपढ़ता है । जहाँ औरतों को अपना और अपने बच्चों का पेट भरना है और उसके लिए दिन रात काम करना है । उन्हें ना ही अपने अधिकारों का ज्ञान है ना ही जानने की फुर्सत । ऐसी महिलाएँ जल्दी से किसी की बात सुनती भी नहीं और समझ भी नहीं पाती ।
तीसरी तरफ ऐसी महिलाएँ भी हैं जो बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी तो नहीं है निश्चित रूप से ही अति महत्वाकांक्षी जरूर है । जिन्होनें अपने अधिकारों की जानकारी प्राप्त कर ली है और इन्हें ही हथियार बनाकर और इसकी आड़ लेकर समाज की सहिष्णुता को नुकसान पहुंचा रही हैं । उन्हें अपने अधिकारों के सदुपयोग से कम मतलब है वो तो इसकी आड़ लेकर पुरूषों को तुच्छ साबित करना चाहती हैं । वे येन प्रकारेण अपने मकसद को पाना चाह रही हैं । उनके साथ किसी प्रकार का शोषण नही होता । वे पुरूषों पर यौन उत्पीड़न का , दहेज का , छेड़खानी का या इसी तरह का कोई अन्य आरोप लगाकर अपने लिए सहानुभूति बटोर लेती हैं । फिर इस सहानुभूति को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करती हैं । टी वी पर या सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए झूठमूठ के अत्याचार की कहानी सुनाकर सुर्खियाँ बटोरना इनकी आदत में शुमार होता हैं । उनके लिए शोहरत बटोरने का यह एक बिना मेहनत का रास्ता है जिसमें हींग लगती है ना फिटकरी और रंग भी चोखा होता है ।
आज के समय में बहुत से कानून औरतों के हक में बनाए गए है । इन कानूनों को बनाने का मकसद सिर्फ इतना था कि औरतों को शोषण से बचाया जा सके । आज के समय में इन सब का दुरुपयोग भी बहुतायत में देखा जा रहा है । अभी हाल में ही कोर्ट में भी कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें बिना वजह लड़के व उसके परिवार को दहेज के झूठे केस में फंसाया जा रहा है। बहुत से घरों का शांतिपूर्ण माहौल इसलिए भी खराब हो रहा है कि बहुएं कानून की धौंस दिखाकर सास ससुर के साथ बदतमीजी कर रही हैं उन्हें डरा धमका रही हैं । लड़कों को शादी के बाद माता पिता से अलग रहने पर मजबूर कर रही हैं । प्रापर्टी में हिस्सेदार बनने के लिए तलाक तक का सहारा लिया जा रहा है । यह सब देखकर बहुत से लड़के तो शादी के नाम से ही डरने लगे हैं । जिससे आने वाले समय में हमारा सामाजिक ताना बाना ही प्रभावित होने वाला है ।
बलात्कार से संबंधित धारा 376 ने तो मानों औरतों के हाथ एक ऐसा औजार दे दिया है जिससे वो किसी भी पुरुष के अहं को ना सिर्फ चोट पहुँचा सकती हैं बल्कि उसका और उसके परिवार की मान मर्यादा को ही खत्म कर देती है । इस तरह के केस में अपने आप को निर्दोष साबित करने की पुरी जिम्मेदारी पुरुष पर होती है जोकि बहुत ही मुश्किल काम होता है । कई बार वह स्वयं को निर्दोष साबित करने में सक्षम नहीं होता और उसे अपना जीवन जेल में ही बिताना पड़ता है । कई बार बेल मिलने पर जेल से तो बाहर आ जाता है परन्तु जब तक मुकद्दमा चलता रहता है वह सामाजिक प्रताड़ना को सहता रहता है ऐसे समय में जब जाॅब छूट जाती है तो उसे और उसके परिवार को आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ता है और उसका मनोबल टूट जाता है । वह लोगों की तिरछी निगाहें और उनके व्यंग्य बाणों को सहने में स्वयं को असमर्थ पाता है ।
1960 और उसके बाद का दौर ऐसा था जिसमें दहेज के लिए बहुत सी औरतों को जलाया गया उनपर तरह तरह के अत्याचार किए गए । समाज में फैली इस कुरीति को समाप्त करने के लिए और दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए 1986 में आईपीसी की धारा 498 -ए का प्रावधान किया गया । आम बोलचाल की भाषा में इसे दहेज निरोधक कानून कहा गया । सभी के द्वारा इस कानून की सराहना की गई । जब इस धारा के अन्तर्गत केस दायर किया जाता था तो यह एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता था और मुजरिम की जमानत तक नहीं होती थी और कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान था । उस समय तो ऐसा लगा कि यह कानून दहेज लोभियों को अच्छा सबक सिखाएगा । लेकिन धीरे धीरे जब इस कानून का दुरुपयोग होना शुरू हुआ तो बहुत से निर्दोष व्यक्ति भी इसकी बलि चढ़ गए । 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में आधे से ज्यादा मामले झूठे है । जुलाई 2017 में 498 A में कुछ संशोधन किया गया अब पुलिस आरोपी व्यक्ति की सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकती उसके लिए हर जिले में जो जाँच कमेटी बनाई गई है पहले वह जाँच करेगी और अगर सबूत मिलते है तो ही गिरफ्तारी होगी ।
लेकिन सितंबर 2018 की सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार ये पावर पुलिस को दे दी गई है वह शिकायत कर्ता की शिकायत पर आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर सकती है । जाहिर सी बात है इस कानून के दुरुपयोग की संभावनाए बहुत ज्यादा थी । एक रिपोर्ट के मुताबिक जितने केस दर्ज किए गए है उनमें 80% झूठे हैं । इसलिए 2021 में 498 A की धारा में कुछ बदलाव किए गए है जिसमें अब पुरुषों को कुछ राहत दी गई है ।
2005 में बनाया गया घरेलू हिंसा के विरूद्ध महिला संरक्षण कानून का भी बहुत दुरूपयोग हुआ है । कई जगह तो यह मांग भी उठने लगी है कि प्रताड़ित पुरुष कहाँ जाए। महिला आयोग की तरह पुरुष आयोग भी बनाया जाना चाहिए जहाँ पुरुष अपनी बात कह सकें और न्याय की उम्मीद रख सकें । न्यायालय को भी इस मामले में अपना नजरिया साफ रखना चाहिए और कानूनों के दुरुपयोग को रोकना होगा।
शोषण के खिलाफ मिले अधिकार
किसी पर भी ना हो फिर अत्याचार