शब्द
शब्दों की भी अपनी अलग शान है
कहने को लगते निर्जीव से है
पर शब्दों में बड़ी जान है
कई शब्द होते है ऐसे
जिनमें समाया सारा जहान है
जादू से होते है कुछ शब्द
दुखी चेहरे की बनते मुस्कान है
कुछ करके अलग शब्दों का इस्तेमाल
समाज में बनाते अलग अपनी पहचान है
कुछ शब्द होते है ऊर्जावान
जगा देते दबे हुए अरमान है
कुछ शब्दों में छिपी होती है प्रेरणा
वो देते सपनों को नई उड़ान है
शब्द ही बिठाते तख्तो ताज पर
कभी दिलाते कफन का सामान है
मिश्री सी घोलते हैं कभी कान में
कभी बजाते ना भूलने वाली तान है
शब्दों का चयन कैसे करना है
अब तो सिखाने के लिए खुल गए संस्थान है
सोच समझ कर बोला करो यारो
इन्हीं से जग में बनती हमारी पहचान है
शब्द चाहे तोड़ दो दिल ना किसी का तोड़ो
टूटे दिल को जोड़ना फिर नहीं आसान है
शब्द टूटकर नए अर्थ में बदल जाते है
नए अर्थ से रचते इतिहास महान है
नीलम नारंग
मुस्कान
बहुत दिनों से छाया हुआ था कुहासा
घेरे हुए थी उदासियाँ
फैलता जा रहा था अँधेरा
मन के हर कोने में घर बना लिया था
एकाकीपन और निराशा ने
इन सब से ऊब कर चली आई
फिर से ढूँढने खुद को
स्मृतियों के बागान में
याद किए बचपन के वो दिन
जब खेलती थी मस्ती में
अँधेरा होने तलक बिना किसी फिक्र के
याद किए जवानी के वो दिन
जब बेवजह खिलखिलाती थी घंटो
मेरी उस निश्छल हँसी को देखकर
मुस्कुरा उठते थे वो चेहरे भी
जिनपर छाई रहती थी उदासी महीनों
याद किए वो दिन भी
जब बच्चों की मोहिनी मुस्कान से
मुस्कुरा उठी थी भूलकर सब रंजो गम
सालों से ये मुस्कान ही मेरी पहचान है
फिर क्यूँ कर रही हूँ कैद अब खुद को
कयूँ ओढ़े हूँ लबादा जिम्मेदारी का
सोचते ही छँट गए बादल निराशा के
फिर करीने से संवारे सफेद बाल
फिर झुर्रीदार चेहरे पर आई मुस्कान
जंग
जंग पर भेजने से पहले हर माँ रोई होगी
फिर रोक आसूँ देख उसे मुसकाई होगी
हर हाल दुश्मन को फतह करके ही आना
मन ही मन होंठों पर यही दुआ लाई होगी
घर पहुंच जाए मेरा लाडला सही सलामत
उस पार भी है एक माँ सोच घबराई होगी
माँ तो माँ है इस पार की हो या उस पार
सलामती की दुआ उसके होठों पर आई होगी
युद्ध अपने आप में सबसे बड़ा मसला है
युद्ध से मसले हल करने में सिर्फ बुराई होगी
युद्ध से सबको सिर्फ तबाही मिलती है
आम जनता ने बार बार ही की ये दुहाई होगी
बेटा इस पार का मरे या मरे उसपार का
आँख तो बस हर औरत की भर आई होगी
अमन शांति भाईचारा बना रहे सब ओर
नीलम के मन में बस यही दुआ आई होगी
नारी
मै नारी
कभी थी आभावों की मारी
जान गई हूँ अपनी कीमत
अब है आई मेरी बारी
अब नहीं आती किसी की बातों में
कुछ मन की करती हूँ
सोचती हूँ अपने बारे में भी
नहीं बनती जरूरत से ज्यादा प्यारी
ठगी गई जो सदियों से
कभी देवी के नाम पर
कभी देवदासी के नाम पर
कभी बनाया कंजक कुँआरी
बना दिया गृहस्वामिनी घर की
बिना दिए कोई अधिकार
और खुश कर दिया
देकर घर की हजार जिम्मेवारी
सीख लिया है नारी ने भी जीना
कैसे खुद को रखना है खुश
समय निकाल लेती है अपने लिए
चाहे बने दासी या फिर अधिकारी
माँ ने कहा
मैनें कहा माँ कहानी सुनकर
नींद अच्छी आती है
वो हँसती खुश होती
और कहानी सुनाती पर
अनपढ़ माँ कहाँ से लाती नई कहानियाँ
जो उसने सुनी थी अपने बचपन में
अपनी माँ नानी या दादी से
सब तो सुना डाली
हर रोज नई कहानी की जिद से तंग
माँ ने कहा
किताबें पढ़ो
और रूबरू करवा दिया
उसने ज्ञान के उस अथाह सागर से
जो भरा हुआ था
अनगिनत किस्सों कथाओं से
अनसुनी अनकही दास्तानों से
डूब गई उसी में
मिल गया एक नया संसार
हर रोज एक नई कहानी
जब भी कोई नया किस्सा पढ़ती
सुनाती खुश होकर माँ को
एक दिन माँ ने जिद की
कुछ ऐसा सुनाओ जो कहीं नही लिखा
और सुनाने लगी मै कहानियाँ
सिर्फ माँ को ही नही सबको
मेरी कहानी सुन सो गई माँ
एक लम्बी शाँत नींद में
कभी ना उठने के लिए
खिड़की
बेमकसद तो नही उठे थे कदम
हाँ बस थोड़ी सी
बेख्याली जरूर थी
बताना जरूरी भी नही समझा
और क्या बताता
बरबस ही उठ जाते है कदम
उस गली की ओर
खड़ा रहता हूँ
उस घर के आगे
घंटो निहारता हूँ
उस खिड़की को
जहाँ से दीदार होता था यार का
माना अब सन्नाटा पसरा रहता है
पर दिल को कहीं सुकून तो मिलता है
निभा रहा हूँ वफा
तेरी बेवफाई के बाद भी
मेरा वक्त मेरा प्यार
आज भी है बस
सिर्फ तेरे लिए
पहली नजर
मुझको याद है तेरी पहली सी वो नजर
हो रहे थे तब हम दुनियाभर से बेखबर
कुछ हसरतें संजोई थी उम्रभर के लिए
ना जाने लग गई कब दुनिया की नजर
दूर हो गए जाने कैसे एक दूसरे से
फिर ना कर पाए इक दूजे की कदर
फंस कर रह गए दुनिया के झंझटों में
कुछ इस तरह से होती रही बस बसर
जब आए फुर्सत से साथ रहने के पल
तब तक हाथ थामने वाला गया गुजर
जीने को जी रहे है खुश भी रहते है
अकेलापन सन्नाटा कहीं गया है पसर
अब तो बरसों गुजर गए हैं तुझे देखे हुए
नीलम को याद है वो तेरी पहली सी नजर
नीलम नारंग