औरत
इच्छाओं को मारकर कयूँ जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
देखकर खुला आसमान चहकती हूँ
उड़ना चाहती हूँ पंख फैला
फिर डर कर दुबक जाती हूँ
कभी शर्मसार हो रूक जाती हूँ
कभी सुन दुहाई समाज की झुक जाती हूँ
कभी बांध दी जाती हूँ बंधनों में
फड़फड़ाती हूँ कोशिश करती हूँ छूटने की
रिश्तों की दुहाई की आड़ में
कयूँ बंधनों में सिमटती जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
अकेले में चुपचाप रो लेती हूँ
बंधन को प्यार से ढो लेती हूँ
ख्वाबों की हसीं दुनिया बसा
अपने आप से ही खुश हो लेती हूँ
बच्चों को पालने की जिम्मेदारी में
खुद को उसमें उलझा लेती हूँ
अपने अधूरे सपने
उनकी आँखों में सजा देती हूँ
निकल जाते हैं वो जब सपना पूरा करने
फिर से मन की बात दोहराती हूँ
कभी हँसी का पात्र बन जाती हूँ
कभी नई राह बना सब कुछ पाती हूँ
हर औरत ऐसे ही जीती है
जाने क्यूँ गमों को पीती है
शीर्षक-बेड़ियां
नहीं पहननी मुझको पायल
ये पायल बेड़ियों सरीखी लगती है
जो रोक लेती है मुझे आगे बढने से
मत खरीदा करो मेरे लिए
ये लाल पीली हरी चूड़ियाँ
ये उलझा देती है मुझे
जिन्दगी की रंगीनियों में
कुछ देना है तो दो हौसला
कर सकूँ हाथों का प्रयोग
हथियार की तरह
वक्त आने पर
भर दो मुझमें आत्मविश्वास
सामना कर सकूँ उन दरिंदों को
देखते है जो मुझे गंदी नजरों से
भर दो मेरी वाणी को ओज से
जवाब दे सकूँ उनकी गलत बातों का
जलाए रखना आशा का एक नया दीप
मेरे लिए हरदम
घिर जाऊँ जब कभी निराशापूर्ण भाव से
विश्वास मुझपर बनाए रखना
ना दाग लगने दूँगी पापा के नाम को
बस इतनी सी चाहत है मेरी
साथ देना मेरा तब भी तुम
जब सारी दुनिया मेरे खिलाफ हो
कयूँ किया प्यार
याद आए आज तुम बेशुमार
सोचती हूँ कयूँ किया प्यार
याद आई बरसती बदलियाँ
फूलों पर डोलती तितलियाँ
कीचड़ में की जो अठखेलियाँ
याद आई अबूझ पहेलियाँ
फिर आए याद वो वादे करार
याद आए आज तुम बेशुमार
सोचती हूँ कयूँ किया प्यार
याद करने को ढूँढ़ती तन्हाई
महसूस करती तेरी परछाई
आसमान में जब बदली छाई
हरदम बस तेरी ही याद आई
फिर याद आई प्यार भरी तकरार
याद आए आज तुम बेशुमार
सोचती हूँ कयूँ किया प्यार
दवा बन जा
ले दर्द सारे किसी के लिए दवा बन जा
लेकर गम बस उसीका हमनवाँ बन जा
सुन किसी के दिल की बात शिद्दत से
प्यार से समझा और राजदाँ बन जा
काम आ दूसरों के सोच गम की बात
देकर साथ सब का खैरखवाह बन जा
सुन दुख किसी का बस हँसते है सब
समझ दर्द किसी का और दवा बन जा
मत सोच लोग क्या सोचते हैं कहते हैं क्या
कर अपने मन की और बेपरवाह बन जा
बाहर निकाल खुद को निराशा के घेरे से
जिन्दा रख बचपन और लापरवाह बन जा
हरदम मदद को हाथ बढाकर नीलम
कायम कर नई मिसाल और दास्ताँ बन जा
करवाचौथ और दिखावा
देश के एक क्षेत्र विशेष की परम्परा करवाचौथ का व्रत बाजारवाद के कारण अन्य राज्यों में अपनी पैठ बिठा रहा है। अब ये उपवास कम उपहास का एक रूप बनता जा रहा है । औरतों में होड़ लगी हुई होती है कपड़े, श्रृंगार और गहनों को लेकर। पति और सास ने क्या दिया या मायके से करवे पर क्या आया और कई बार इसी बात को लेकर कई दिनों तक घर में तनाव का माहौल भी रहता है । माना परम्पराओं और संस्कृति को बनाए रखना और निभाना बहुत अच्छा है लेकिन उसकी आड़ में दिखावा कैसा । कल फेसबुक और वहटसअप देखते हुए मैनें उन औरतों की भी व्रत करते हुए की फोटो देखी जो कई सालों से पति से अलग रह रही है या जिन्होंने तलाक लिया हुआ है । कल से इसके पीछे का औचित्य ढूँढ रही हूँ।
प्यार बाकी है
मेरे दिल में तेरे हिस्से का प्यार बाकी है
आज भी करना तेरा इंतजार बाकी है
चाहतों पर कब किसका बस चला है
कुछ अधूरे वादे कुछ करार बाकी है
तुझे पाने के लिए बरसों भटकी दर बदर
चल आ चलें अभी एक मजार बाकी है
जानती हूँ चाहत तो है तुम्हें भी है मुझसे
ये अलग बात है अभी इजहार बाकी है
ढूंढ़ ही लेते हो रास्ते मुझसे दूर रहने के
तुझे पास बुलाने के मौके हजार बाकी है
क्या खुशी से जी पाओगे मुझसे दूर रहकर
कयूँ नहीं कर लेते अभी जो इसरार बाकी है
कयूँ बेवजह की जिद ये कैसी तकरार बाकी है
हो ही जाओगे मेरे नीलम का एतबार बाकी है
बेवजह
जिन्दगी के दाग दिखाए नही जाते
कुछ राज सबको बताए नही जाते
मिल जाते है कुछ खुशनसीब ऐसे
जिनसे जख्म सारे छिपाए नही जाते
साथी तो बहुत है हाथ थामने वाले
सब के लिए हाथ बढाए नही जाते
मजाक बना लेते है दिल की बात का
सबको अपने सपने सुनाए नहीं जाते
रुलाने के लिए तैयार बैठा है हर कोई
सबके लिए तो आँसू बहाए नहीं जाते
कभी तो बात कर मुझसे हकीकत की
सपनों के शहर में घर बसाए नहीं जाते
मुस्कुराने की फितरत को यूँ ही रख
बेवजह नीलम दिल जलाए नहीं जाते