वो गलियां
जैसे-जैसे ये उम्र ढलने लगी है |
पुरानी सी यादें घर करने लगी है||
याद आते है बचपन के दोस्त|
वो गालियां भली लगने लगी है ||
वैसे तो जा नहीं पाते उस शहर में|
सपनों में गलियां भटकने लगी है||
वक़्त की मजबूरी से आ निकले दूर|
सांसे वहाँ के लिए अटकने लगी है||
अब मिली फुरसत याद करने की|
वो भी जब सांस उखड़ने लगी है||
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