नारी
मै नारी
कभी थी आभावों की मारी
जान गई हूँ अपनी कीमत
अब है आई मेरी बारी
अब नहीं आती किसी की बातों में
कुछ मन की करती हूँ
सोचती हूँ अपने बारे में भी
नहीं बनती जरूरत से ज्यादा प्यारी
ठगी गई जो सदियों से
कभी देवी के नाम पर
कभी देवदासी के नाम पर
कभी बनाया कंजक कुँआरी
बना दिया गृहस्वामिनी घर की
बिना दिए कोई अधिकार
और खुश कर दिया
देकर घर की हजार जिम्मेवारी
सीख लिया है नारी ने भी जीना
कैसे खुद को रखना है खुश
समय निकाल लेती है अपने लिए
चाहे बने दासी या फिर अधिकारी
माँ ने कहा
मैनें कहा माँ कहानी सुनकर
नींद अच्छी आती है
वो हँसती खुश होती
और कहानी सुनाती पर
अनपढ़ माँ कहाँ से लाती नई कहानियाँ
जो उसने सुनी थी अपने बचपन में
अपनी माँ नानी या दादी से
सब तो सुना डाली
हर रोज नई कहानी की जिद से तंग
माँ ने कहा
किताबें पढ़ो
और रूबरू करवा दिया
उसने ज्ञान के उस अथाह सागर से
जो भरा हुआ था
अनगिनत किस्सों कथाओं से
अनसुनी अनकही दास्तानों से
डूब गई उसी में
मिल गया एक नया संसार
हर रोज एक नई कहानी
जब भी कोई नया किस्सा पढ़ती
सुनाती खुश होकर माँ को
एक दिन माँ ने जिद की
कुछ ऐसा सुनाओ जो कहीं नही लिखा
और सुनाने लगी मै कहानियाँ
सिर्फ माँ को ही नही सबको
मेरी कहानी सुन सो गई माँ
एक लम्बी शाँत नींद में
कभी ना उठने के लिए
खिड़की
बेमकसद तो नही उठे थे कदम
हाँ बस थोड़ी सी
बेख्याली जरूर थी
बताना जरूरी भी नही समझा
और क्या बताता
बरबस ही उठ जाते है कदम
उस गली की ओर
खड़ा रहता हूँ
उस घर के आगे
घंटो निहारता हूँ
उस खिड़की को
जहाँ से दीदार होता था यार का
माना अब सन्नाटा पसरा रहता है
पर दिल को कहीं सुकून तो मिलता है
निभा रहा हूँ वफा
तेरी बेवफाई के बाद भी
मेरा वक्त मेरा प्यार
आज भी है बस
सिर्फ तेरे लिए
पहली नजर
मुझको याद है तेरी पहली सी वो नजर
हो रहे थे तब हम दुनियाभर से बेखबर
कुछ हसरतें संजोई थी उम्रभर के लिए
ना जाने लग गई कब दुनिया की नजर
दूर हो गए जाने कैसे एक दूसरे से
फिर ना कर पाए इक दूजे की कदर
फंस कर रह गए दुनिया के झंझटों में
कुछ इस तरह से होती रही बस बसर
जब आए फुर्सत से साथ रहने के पल
तब तक हाथ थामने वाला गया गुजर
जीने को जी रहे है खुश भी रहते है
अकेलापन सन्नाटा कहीं गया है पसर
अब तो बरसों गुजर गए हैं तुझे देखे हुए
नीलम को याद है वो तेरी पहली सी नजर
नीलम नारंग
सच्चा मित्र
खुशियों के आलम में
साथ मुस्कुरा गया
दुख भरे दिनों में
रोते को हँसा गया
जब भी कोई परेशानी आयी
वक़्त साथ बिता गया
आह निकली जब भी लबों से
दुआ सा होठों पे आ गया
राह चलते चलते थक गया कभी
हाथ उसका मेरे हाथों में आ गया
मुड़ा जब कभी किसी गलत राह पर
रास्ता सही दिखा गया
भटक गया जब किसी के बहकावे से
कदमों को मेरे संभाल गया
जब कभी आ घेरा किसी बीमारी ने
प्यार से माथा मेरा सहला गया
लगता है जन्मों का रिश्ता है तेरा मेरा
हरकदम साथ तू निभा गया
जीवन भर के संघर्ष में साथ रह
सही मायने में सच्चा मित्र हूँ मै
बिन बताए ये बता गया
देह
एक स्त्री की देह से ही
पोषित सिंचित हुए तुम
रगो में लहु दौड़ा उसीका
देह से बाहर निकल
अस्तित्व बना तुम्हारा
लाड-प्यार दुलार दिखाकर
पहनना औढना सिखाकर
पढा लिखाकर
हुनर जीने का बताकर
गढ़ा चरित्र तुम्हारा
तेरे हिस्से का काम कर
तेरी नादानियों को छिपा
पोंछ तेरे आँसुओं को
खुशियों की राह दिखाकर
गढ़ दिया किरदार तुम्हारा
जब कभी कदम रूके तेरे
लगा जीवन थम गया
आशा की नई किरण दिखाकर
निराशा के अंधेरों से निकाल कर
संवार दिया जीवन तुम्हारा
साथ तेरे खड़ी रही हरदम
धड़कन तेरी बनी रही
भटकते कदमों को सही दिशा दिखाकर
नित उमंगों के दिए जलाकर
खुशियों से भर दिया दामन तुम्हारा
औरत
इच्छाओं को मारकर कयूँ जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
देखकर खुला आसमान चहकती हूँ
उड़ना चाहती हूँ पंख फैला
फिर डर कर दुबक जाती हूँ
कभी शर्मसार हो रूक जाती हूँ
कभी सुन दुहाई समाज की झुक जाती हूँ
कभी बांध दी जाती हूँ बंधनों में
फड़फड़ाती हूँ कोशिश करती हूँ छूटने की
रिश्तों की दुहाई की आड़ में
कयूँ बंधनों में सिमटती जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
अकेले में चुपचाप रो लेती हूँ
बंधन को प्यार से ढो लेती हूँ
ख्वाबों की हसीं दुनिया बसा
अपने आप से ही खुश हो लेती हूँ
बच्चों को पालने की जिम्मेदारी में
खुद को उसमें उलझा लेती हूँ
अपने अधूरे सपने
उनकी आँखों में सजा देती हूँ
निकल जाते हैं वो जब सपना पूरा करने
फिर से मन की बात दोहराती हूँ
कभी हँसी का पात्र बन जाती हूँ
कभी नई राह बना सब कुछ पाती हूँ
हर औरत ऐसे ही जीती है
जाने क्यूँ गमों को पीती है