Sunday, 27 September 2020

बेटी जैसा

 बेटी जैसा 

मुझेभी अब समझ आया
जब क्षीण हो गयी काया
अकेलेपन में विदा की हुई
बेटी का हँसता चेहरा नजर आया
हाय रे
सब बेटी को ही कयूं बतलाया
बेटे को क्यु ना कुछ समझाया
क्यु ना डाली घर की जिम्मेदारी
क्यु ना घर का काम सिखाया
जब घर दो लोगों का है
तब दोनों को क्यु ना बराबर समझाया
बचपन में जो था पढाना
ज़वानी में भी ना पढाया
खुशियों में ना साथ हँसाया
दुखों में ना पास बैठ रुलाया
जब बेटी को बेटे जैसे पाला
निर्भीक बना भेजा बाहर
अपनी रक्षा को सक्षम बनाया
तो क्यु ना बेटे को बेटी जैसे बनाया
रोटी बनाना कपड़े धोना सिखाया
चूक हुई मुझसे ही कहीं
अब बेटे को ही क्यु दोषी ठहराया
एहसास तो गलती का उसे भी है
ऐंठ में गलती मानना भी कहां भाया
अब भी वक़्त है संभल जाओ ए माओं
बेटे को कुछ कुछ बेटी जैसा बनाओ
नीलम नारंग 

Sunday, 23 August 2020

इंसान आज का

                 कल की इंतजार में खो गया समां आज का 

                  कुछ इस कदर हो गया इनसान आज का


                  कल होगा आज से भी बेहतर इसी सोच में 

                  कैसे कब बेमक़सद हो गया इनसान आज का 


                 आज की खुशियों को रखा गिरवी कल पर 

                   फ़िर आज को ना जी पाया इनसान आज का 


                   बनाने कल को बेहतर चल रहा है शूलो पर 

                   निहार फूलों को ना पाया इनसान आज का 


                  लगी रही होड़ उम्र भर दूसरों को पछाड़ने की 

                 अपने आप से जीत ना पाया इनसान आज का 


                 हर साल खुश हो जलाता रहा पुतला रावण का 

               राम सा ना बना पाया खुद को इंसान आज का 


               

Wednesday, 12 August 2020

Be Positive

 


   At the end of taking online class I wrote a message to be positive . After that , I kept my phone aside and got busy in domestic work . Some time later , I checked my phone to see so many missed calls and messages . One of the parents had questioned what type of teacher I am ? Why you want to make our children positive ? I looked the message and realized my mistake . I deleted it and wrote sorry with great smile. 

Tuesday, 11 August 2020

देश प्रेम

 


                                देश प्रेम 

                 देश प्रेम सीमित नहीं होता 

                 देश की आजादी  तक 

                  ये चलता रहता है 

                 हर एक को इन्साफ मिलने तक 


              देश प्रेम निहित नहीं होता 

            देश प्रेम के सपनों तक 

        ये चलता रहता है 

       हर एक के सपने साकार होने तक 


                    देश प्रेम प्रतीत नहीं होता 

            कुछ हाथों में सत्ता होने से 

           संघर्ष चलता रहता है

           सबके सत्ता में शामिल होने तक 


            देश प्रेमी खुश नहीं होता 

         कुछ लोगों के खुश होने पर 

       वो इन्तजार करता है 

      सबका खुशियों में शामिल होने तक 



Tuesday, 4 August 2020

कठिन दौर




                                      कठिन दौर 

                   ये कैसा कठिन दौर है आया 
                  अपनों को अपनों से डराया 

                वायरस को समझ नहीं पाया 
                 हर तरफ  है  खौफ का साया 
             
              रोज की भागदौड़ ने छकाया 
              वायरस ने घर में कैद करवाया 

              मजदूरों को घर से बेघर करवाया 
              तपती धूप में सड़को पर भगाया 
  
                माली हालत ने सबको सताया 
                दूरियों की जरुरत का समझाया 

              नियम बनाकर सबको समझाया 
              समझ कर भी समझ न कोई पाया 

              घर की जिमेदारी ने सबको भगाया 
               डर के साए ने भी हौसला बढाया 

                जीने का नया पाठ बच्चों को पढाया 
              अपना बचपन फिर से याद करवाया 


          

Tuesday, 28 July 2020

देश के पहरेदार




                   देश के पहरेदार

          हो रही है कैसे  जिंदगी की
          गुजर बसर देख लो
        मच रही है हाय तौबा चारों ओर
       घुमा के नजर देख लो

      डूब रहे है लोग बाढ़ के पानी में
      मचा हाहाकार देख लो
     छोड़ कर हित जनता के नेता लड़ते
       वोट के खरीददार देख लो

       लड़ा देते है इंसान को इंसान से
       ऐसे देश के पहरेदार देख लो
       धर्म के नाम पर आपस में कटते मरते
        लोग जिम्मेदार देख लो

       करके झूठे वादे आ जाते राजनीति में
       नहीं होते सपने साकार देख लो
       लूट खसोट मचाते दूसरों को लड़वाते
       राजनीति के ठेकेदार देख लो 

Tuesday, 21 July 2020

अखबार आज का



                                     अखबार आज का

       अबूझ पहेलियों से भरा है अखबार आज का
       बस बता रहा जातीय समीकरण आज का

       पेज भरा हुआ है मौज मस्ती के विज्ञापनों से
      दूसरी ओर बेजार फटेहाल मजदूर आज का

      एक पेज पर है अधनंगी तस्वीरें औरतों की
     कुछ की मजबूरी कुछ मजा लेती आज का

      बांटते कम हैं राशन दिखावा करते ज्यादा
      कुछ इस तरह हो गया है सेवादार आज का

        हर तरफ डर परेशानी बढ़ता दायरा शक का
       बढ़ गया संक्रमण ख़राब है माहौल आज का

       ऐसे में भी लगे हैं बटोरने चोरी का धन माल
     कितना खुदगर्ज हो गया है इंसान आज का

      सच से कोसो दूर है नहीं जगह है समानता की
      अखबार नहीं  दिखा रहा झूठ फरेब आज का