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नजारों से दिल ये भटकने लगा है
करूं क्या ये मन अब बिदकने लगा है
हो सकता है मेरा वहम या हो धोखा
वफ़ा भ्रम बन क्यों खटकने लगा है
है मुश्किल डगर सच की चलना तो है ही
फरेबी जहां से सटकने लगा है
महंगा पड़ा बोलना सच मुझे यूं
दिया आस का अब चटकने लगा है
सुनाई जो दास्तां दुखों की उसे अब
वो फिर पैर नीलम पटकने लगा है






