122 122 122 122
1.यहाँ की हवा में घुला अब जहर है
चलो गांव को छोड़ना ये शहर है
2.बिगुल जंग छिड़ने का बजने लगा है
धरा पर हमारी ये कैसा कहर है
3.बताए सलीका यूं जीने का सागर
सिखाती बहुत कुछ हमें हर लहर है
अभी दूर है शाम इस जिंदगी की
ढली तो यहाँ बस अभी दोपहर है
समा खूबसूरत यूँ लगने लगा अब
मुबारक तुझे नील सुंदर सहर है

No comments:
Post a Comment