Tuesday, 7 October 2025

गज़ल 22

 



122    122     122   12

तेरी याद में बुत बनाउंगा मैं
उसी बुत से घर को सजाऊंगा मैं

उधारी बढ़ी है कमाई घटी
रखा कर्ज लेकिन चुकाऊंगा मैं

अभी तक  मैं बेघर  गली में रहा
किसी दिल में इक घर बसाऊंगा मैं

जिन्होंने अभी तक दिया है दग़ा
उन्हीं को गले से लगाऊंगा मैं

लिखा था कभी ख़त उसे प्यार से
जुदाई पे सबको पढ़ाऊंगा मैं

तेरी याद में बुत बनाउंगा मैं
उसी बुत से घर को सजाऊंगा मैं
         

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