तुझमें भी हुनर था दिल लगाने का
मुझे भी नशा था वफा निभाने का
फिर भी कयूँ रास्ते हो गये जुदा जुदा
शायद जज्बा नहीं था मनाने का
लोग खाते रहे कसमें हमारे इश्क़ की
हम इल्म ही भूल गए अपने फसाने का
जिस शिद्दत से शुरू हुई थी मुहब्बत
वो पहला लफ्ज़ ही खो गया तराने का
आ फिर से महसूस करें पहली सी कसक
क्यूँ पाले भ्रम इक दुजे को भुलाने का
फिर से हवा दें बुझती हुई चिंगारी को
क्यूँ इंतजार करें इसके राख हो जाने का
आ एक मिसाल कायम करें साथ होकर
क्यूँ सोचे बीते वक़्त को आईना दिखाने का
तुझमें भी हुनर था दिल लगाने का
मुझे भी नशा था वफा निभाने का
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