तेरे शहर में
तेरे शहर में आकर तेरे दीदार को तरसे
कैसे कहूँ हरदम ही तेरे प्यार को तरसे
घर अब ईंट पत्थर का सा मकान लगे
देखकर इसको पगले नैना यूँ ही बरसे
तेरी यादों के सहारे ही खुश रहना है
मिले हुए लगता है बीत गऐ हो अरसे
तुम क्या गए छोड़ कर मुझे मझधार में
छिन गया हो आसमां जैसे मेरे सर से
नीलम नारंग
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