Thursday, 8 August 2024

भीड़

             भीड़

भीड़ का कोई मजहब नही होता

कोई जात कोई रंग नही होता

ये होती है जरखरीद गुलामों की

अपने आप से कुठिंत मासुमों की 

भूल जाती है इंसानियत

खो जाता है व्यक्ति का वजूद अपना

समझ ही नही पाती 

कब भेंट चढ़ जाती है सियासतदानों की 

सब होते तो एक ही बिरादरी के हैं

कदर नही करते अपने इंसानों की 







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