भीड़
भीड़ का कोई मजहब नही होता
कोई जात कोई रंग नही होता
ये होती है जरखरीद गुलामों की
अपने आप से कुठिंत मासुमों की
भूल जाती है इंसानियत
खो जाता है व्यक्ति का वजूद अपना
समझ ही नही पाती
कब भेंट चढ़ जाती है सियासतदानों की
सब होते तो एक ही बिरादरी के हैं
कदर नही करते अपने इंसानों की
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