मुंतज़िर हूँ आज भी तेरी इक आवाज का
गीत लिख लिए कई इंतजार है साज का
शायद इस तरह ढ़ूंढ़ पांऊ तेरे दिल में जगह
बना सकूँ मुरीद तुझे अपने अल्फाज का
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