Saturday, 18 February 2023

बिखर कर

 

बिखर सी जाती हूं कभी खुद में ही
कभी समेट लेती हूं खुद को खुद में ही
कभी असमंजस सी की डगर पर
चल निकलती हूँ अनजान राहों पर
कभी घंटों बैठी रहती हूं  मौन
कभी बच्चों सी खिलखिलाती हूँ
कभी  बैठ नदिया किनारे  बहा देती हूँ
अपने जज्बातों को बहते पानी में
कभी बांध लेती हूँ खुद को
अतीत की सुन्दर यादों के बंधन में
कभी ये यादें छलक जाती हैं
आंखों से मोतियों की लड़ी बनकर
कभी नये बनते टूटते बंधनों में ही
ढूंढती रहती हूं खुद को घंटों
खुद से ही समेटे हुए  खुद को
कभी खुद से जुदा करते हुए
         नीलम नारंग

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