लाचार किया है
कब मैंने अपनी चाहतों का इजहार किया है
फिर क्यूँ तुमने रुसवा सरे बाजार किया है
जुदा कर ली थी राहें अपनी बरसों पहले
फिर किस रिश्ते से अपना हकदार किया है
आरजू तो कभी रखी ही नहीं थी फूलों की
फिर तेरे लिए क्यूँ जिन्दगी को खार किया है
प्यार एक अहसास है जो दिल से बाबसतां है
कब किसने इसे जबरदस्ती स्वीकार किया है
माना तुमने इजहार कर दिया मोहब्बत का
जरूरी तो नहीं मैनें तुझसे ही प्यार किया है
दफन रहने दो सीने में इस इकतरफा प्यार को
कयूँ मानने पर इसे इतना मुझे लाचार किया है
जी लो दो दिन हँसी खुशी से जो मिला है
अपने लिए कयूँ दूसरों को खाकसार किया है
कुछ हासिल नहीं होगा झूठी हमदर्दी से
नीलम किसलिए इज्जत को तार तार किया
बहुत खूब
ReplyDeleteवाह।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Delete