याद आने लगे है
नए सब्जबाग कयूँ दिखाने लगे हैं
छोड़ महबूब का घर वो आने लगे हैं
बागी हो उठे हैं तेवर देखकर उन्हें
कयूँ रोज नए नजराने लाने लगे हैं
हो जाऊँगी एक दिन मै उसकी
कयूँ मन अपना रोज भरमाने लगे हैं
दोस्ती प्यार में बदलती नहीं यूँ
बेवजह हक अपना जताने लगे हैं
माना सांझी यादें है कुछ बरसातों की
कयूं बातें पुरानी याद दिलाने लगे हैं
हर फासले तय किए है साथ साथ
किसलिए चाहत नई फरमाने लगे हैं
साथ रहने की हसरत पाल ली है
कयूँ ऐसे सपने मन में सजाने लगे हैं
जानते हो फर्क नहीं था तेरे मेरे बीच
अब कैसे बेवजह शान दिखाने लगे हैं
दरक गया जो रिश्ता वक्त ओ हालात से
दोबारा उसके फसाने कयूँ बनाने लगे हैं
खत्म हो गए थे एहसास जिसके लिए
बीते वक्त की बात कयूँ दोहराने लगे हैं
Nice
ReplyDeleteThanks dear
DeleteVery nice, बहुतअछे अल्फ़ास हैं.
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
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