धर्म की आड़ में
कुछ दिनों से रोज जब भी अखबार पढ़ती हूँ छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं से मन बहुत दुखी होता है | गरीब घर की छोटी लडकियां सबसे आसान शिकार होती हैं | बीमार मानसिकता वाले लोग अपनी हवस पुरी करने के लिए किसी न किसी तरह लालच देकर या जबरदस्ती से बच्चियों को अपने पास बुला लेते हैं |
ये वो लड़कियां होती हैं जिनके माँ बाप कहीं मजदूरी करते हैं या खेतों पर काम करते हैं | आदमी औरत दोनों के लिए काम करना जरुरी हो गया है | बच्चों को अकेले छोड़ना उससे भी बड़ी मजबूरी | इस तरह की घटनाएँ सारी मानव जाति के लिए शर्मनाक हैं | किसी भी समाज में किसी भी देश में इस तरह की घटनायें मानवता को शर्मसार करती हैं |
लेकिन आजकल जो चलन चल पड़ा है वो मुझे बहुत विचलित करता है कुछ लोग इसे भी हिन्दू मुस्लिम रंग देने की कोशिश करते है जो किसी भी तरह से मान्य नहीं हो सकता | कैसी विडंबना है हमारे समाज की ? जिस बुराई को रोक नहीं सकते उसे सांपरदायिक रंग दे दो | लोगो को मुद्दे से ही भटका दो | कितनी शारीरिक व मानसिक यंत्रणा भुगतती है वो बच्ची व उसके माँ बाप |
बस ! ये बुराई अब जड़ से ख़तम होनी ही चाहिए | अगर ऐसी बच्चियों के लिए कुछ नहीं केर सकते तो कम से कम धर्म की आड़ तो मत लो |
ये वो लड़कियां होती हैं जिनके माँ बाप कहीं मजदूरी करते हैं या खेतों पर काम करते हैं | आदमी औरत दोनों के लिए काम करना जरुरी हो गया है | बच्चों को अकेले छोड़ना उससे भी बड़ी मजबूरी | इस तरह की घटनाएँ सारी मानव जाति के लिए शर्मनाक हैं | किसी भी समाज में किसी भी देश में इस तरह की घटनायें मानवता को शर्मसार करती हैं |
लेकिन आजकल जो चलन चल पड़ा है वो मुझे बहुत विचलित करता है कुछ लोग इसे भी हिन्दू मुस्लिम रंग देने की कोशिश करते है जो किसी भी तरह से मान्य नहीं हो सकता | कैसी विडंबना है हमारे समाज की ? जिस बुराई को रोक नहीं सकते उसे सांपरदायिक रंग दे दो | लोगो को मुद्दे से ही भटका दो | कितनी शारीरिक व मानसिक यंत्रणा भुगतती है वो बच्ची व उसके माँ बाप |
बस ! ये बुराई अब जड़ से ख़तम होनी ही चाहिए | अगर ऐसी बच्चियों के लिए कुछ नहीं केर सकते तो कम से कम धर्म की आड़ तो मत लो |